आज द्रौपदी नग्न हो रही भीड़ भरे चौराहों पर...

वह आजादी कहाँ मिली?
रजनीकांत शुक्ल

जैसी तुम कहते थे साथी, वह आजादी कहाँ मिली?
जनगण के मन की अभिलाषा, आखिर जाकर कहाँ फली?

आज द्रौपदी नग्न हो रही भीड़ भरे चौराहों पर,
तोड़े जंघा दुर्योधन की, कहाँ भीम से महाबली?

बीते दशक मगर अब तक, जंजीर होंठ पर भाषा की,
राष्ट्र अभी तक मूक, राष्ट्र को अपनी वाणी कहाँ मिली?

मेहनत अगर बराबर तो मेहनत का दाम बराबर है,
अधिकारों का यह बंटवारा, जहाँ मिले वह कौन गली?

रावण को तो मारा हमने, पर लौट केघर में हार गए,
एक बार संस्कृरति की सीता फिर अपनों से गई छली।

उन राहों का देख हश्र हम उन पर ही बढ़ते जाते,
अहं प्रश्न है आज यह सोचें, क्या शिक्षा का अर्थ यही?

Keywords: Rajnikant Shukla, Hindi Ghazal, Hindi Kavita, Hindi Poetry, Samyik Kavita, Indian Poetry, Modern Poetry

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एक सदी शोषण की जी ली...

एक सदी शोषण की जी ली...
-रामेन्‍द्र त्रिपाठी

एक सदी शोषण की जी ली, अगली फिर जीनी है डर की।
दोहरे मापदण्‍ड जीवन के, फूल गाँव के, गंध नगर की।।

चक्रवृद्धि का ब्‍याज चुकाकर सचमुच सस्‍ते छूटे,
बाहर बाहर ही हम साबुत, भीतर-भीतर टूटे।
वैसे ही फिर याद आ गई, अपने कच्‍चे घर की।।

झूठे धनुष, बाण सब झूठे, लक्ष्‍य भेद क्‍या जानें,
भौतिकता में खो बैठे हैं, हम अपनी पहचानें।
सच तो यह है चिन्‍ता है बस सबको आज उदर की।।

महारथी अभिमन्‍यु वध तक सीमित हैं बेचारे,
कैसे जिये परीक्षित इसकी सोचे कौन विचारे।
अंधियारे ने काली कर दी चादर है खद्दर की।।

Keywords: Ramendra Tripathi, Kavita, Geet, Hindi Poetry, Geetkar, Hindi Poet, Modern Hindi Poet, Adhunik Kavita
Post Written by +DrZakir Ali Rajnish
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जागो पहरेदार, लुटेरे आए हैं...


लुटेरे आए हैं...
-रजनीकांत शुक्‍ल

जागो पहरेदार, लुटेरे आए हैं।
हाथ करो हथियार, लुटेरे आए हैं।

बहुत सो लिए कुंभकर की निद्रा में,
अब न करो तुम प्‍यार लुटेरे आए हैं।

दो रंगा है खून, दोमुंही बातें हैं,
बनकर रंगे सियार, लुटेरे आए हैं।

मौसम में दलाव, बदौलत इनकी है,
फाश हो रहे राज, लुटेरे आए हैं।

राणा का भाला, झांसी की रानी की,
कहां गई तलवार, लुटेरे आए हैं।

पूजे जाते कांटे, फूल सिसकते हैं,
बदली चमन बहार, लुटेरे आए हैं।

हालात बदतर हुई, एक ही कारण है,
माफ किया हर बार, लुटेरे आए हैं।

बूढ़ा मर्द, जवां, बच्‍चा, औरत कोई,
खून इन्‍हें दरकार, लुटेरे आए हैं।

आजानों की सदा, वेद पाठों की गूंज,
बदल गई झंकार, लुटेरे आए हैं।

ऊधम की पिस्‍तौल, भगत का बम कहां,
गिद्ध बने सरदार, लुटेरे आए हैं।

Keywords: Rajnikant Shukla, Ghazal, Hindi Kavita, ग़ज़ल,
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जज़्बात कोई खेल दिखाने का फ़न नहीं!

जज़्बात कोई खेल दिखाने का फ़न नहीं
 -रमेश तैलंग

दुःख दर्द की मिठास को खारा नहीं बना.
खामोशी को ज़ुबान दे, नारा नहीं बना.

जिसने जमीन से लिया है खाद औ’ पानी
उस ख्वाब को फ़लक का सितारा नहीं बना.

वो बेज़ुबां है पर तेरी जागीर तो नहीं,
उसको, शिकार के लिए, चारा नहीं बना.

घुटने ही टेक दे जो सियासत के सामने,
अपने अदब को इतना बिचारा नहीं बना.

जज़्बात कोई खेल दिखाने का फ़न नहीं
जज़्बात को जादू का पिटारा नहीं बना.

इंसान की फितरत तो है शबनम की तरह ही,
अब उसको, जुल्म कर के, अंगारा नहीं बना.

नाम बड़े दर्शन छोटे: काका हाथरसी

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नाम बड़े दर्शन छोटे
-काका हाथरसी

नाम-रूप के भेद पर कभी किया है गौर?
नाम मिला कुछ और तो, शक्ल-अक्ल कुछ और
शक्ल-अक्ल कुछ और, नैनसुख देखे
काने बाबू सुंदरलाल बनाए ऐंचेताने कहँ
‘काका’ कवि, दयाराम जी मारें मच्छर
विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर

मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप
श्यामलाल का रंग है जैसे खिलती धूप
जैसे खिलती धूप, सजे बुश्शर्ट पैंट में
ज्ञानचंद छै बार फेल हो गए टैंथ में
कहँ ‘काका’ ज्वालाप्रसाद जी बिल्कुल ठंडे
पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे

देख, अशर्फीलाल के घर में टूटी खाट
सेठ भिखारीदास के मील चल रहे आठ
मील चल रहे आठ, कर्म वेफ मिटें न लेखे
धनीराम जी हमने प्रायः निर्धन देखे
कहँ ‘काका’ कवि, दूल्हेराम मर गए क्वाँरे
बिना प्रियतमा तड़पें प्रीतम सिंह बिचारे

दीन श्रमिक भड़का दिए, करवा दी हड़ताल
मिल-मालिक से खा गए रिश्वत दीनदयाल
रिश्वत दीनदयाल, करम को ठोंक रहे हैं
ठाकुर शेर सिंह पर कुत्ते भौंक रहे हैं
‘काका’ छै फिट लंबे छोटूराम बनाए
नाम दिगंबर सिंह वस्त्र ग्यारह लटकाए

पेट न अपना भर सके जीवन-भर जगपाल
बिना सूँड़ के सैकड़ों मिलें गणेशीलाल
मिलें गणेशीलाल, पैंट की क्रीज सँभारी
बैग कुली को दिया चले मिस्टर गिरधरी
कहँ ‘काका’ कविराय, करें लाखों का सट्टा
नाम हवेलीराम किराए का है अट्टा

दूर युद्ध से भागते, नाम रखा रणधीर
भागचंद की आज तक सोई है तकदीर
सोई है तकदीर, बहुत-से देखे-भाले
निकले प्रिय सुखदेव सभी, दुख देने वाले
कहँ ‘काका’ कविराय, आँकड़े बिल्कुल सच्चे
बालकराम ब्रह्मचारी के बारह बच्चे

चतुरसेन बुद्धू मिले, बुद्धसेन निर्बुद्ध
श्री आनंदीलालजी रहें सर्वदा क्रुद्ध
रहें सर्वदा क्रुद्ध, मास्टर चक्कर खाते
इंसानों को मुंशी तोताराम पढ़ाते
कहँ ‘काका’, बलवीर¯सह जी लटे हुए हैं
थान सिंह के सारे कपड़े फटे हुए हैं

बेच रहे हैं कोयला, लाला हीरालाल
सूखे गंगाराम जी, रूखे मक्खनलाल
रूखे मक्खनलाल, झींकते दादा-दादी
निकले बेटा आशाराम निराशावादी
कहँ ‘काका’ कवि, भीमसेन पिद्दी-से दिखते
कविवर ‘दिनकर’ छायावादी कविता लिखते

आकुल-व्याकुल दीखते शर्मा परमानंद
कार्य अधूरा छोड़कर भागे पूरनचंद
भागे पूरनचंद अमरजी मरते देखे
मिश्रीबाबू कड़वी बातें करते देखे
कहँ ‘काका’, भंडार सिंह जी रीते-थोते
बीत गया जीवन विनोद का रोते-धोते

शीला जीजी लड़ रहीं, सरला करतीं शोर
कुसुम, कमल, पुष्पा, सुमन निकलीं बड़ी कठोर
निकलीं बड़ी कठोर, निर्मला मन की मैली
सुध सहेली अमृतबाई सुनीं विषैली
कहँ ‘काका’ कवि, बाबूजी क्या देखा तुमने?
बल्ली जैसी मिस लल्ली देखी है हमने

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