वह आजादी कहाँ मिली?
रजनीकांत शुक्ल
जैसी तुम कहते थे साथी, वह आजादी कहाँ मिली?
जनगण के मन की अभिलाषा, आखिर जाकर कहाँ फली?
आज द्रौपदी नग्न हो रही भीड़ भरे चौराहों पर,
तोड़े जंघा दुर्योधन की, कहाँ भीम से महाबली?
बीते दशक मगर अब तक, जंजीर होंठ पर भाषा की,
राष्ट्र अभी तक मूक, राष्ट्र को अपनी वाणी कहाँ मिली?
मेहनत अगर बराबर तो मेहनत का दाम बराबर है,
अधिकारों का यह बंटवारा, जहाँ मिले वह कौन गली?
रावण को तो मारा हमने, पर लौट केघर में हार गए,
एक बार संस्कृरति की सीता फिर अपनों से गई छली।
उन राहों का देख हश्र हम उन पर ही बढ़ते जाते,
अहं प्रश्न है आज यह सोचें, क्या शिक्षा का अर्थ यही?
Keywords: Rajnikant Shukla, Hindi Ghazal, Hindi Kavita, Hindi Poetry, Samyik Kavita, Indian Poetry, Modern Poetry
रजनीकांत शुक्ल
जैसी तुम कहते थे साथी, वह आजादी कहाँ मिली?
जनगण के मन की अभिलाषा, आखिर जाकर कहाँ फली?
आज द्रौपदी नग्न हो रही भीड़ भरे चौराहों पर,
तोड़े जंघा दुर्योधन की, कहाँ भीम से महाबली?
बीते दशक मगर अब तक, जंजीर होंठ पर भाषा की,
राष्ट्र अभी तक मूक, राष्ट्र को अपनी वाणी कहाँ मिली?
मेहनत अगर बराबर तो मेहनत का दाम बराबर है,
अधिकारों का यह बंटवारा, जहाँ मिले वह कौन गली?
रावण को तो मारा हमने, पर लौट केघर में हार गए,
एक बार संस्कृरति की सीता फिर अपनों से गई छली।
उन राहों का देख हश्र हम उन पर ही बढ़ते जाते,
अहं प्रश्न है आज यह सोचें, क्या शिक्षा का अर्थ यही?
Keywords: Rajnikant Shukla, Hindi Ghazal, Hindi Kavita, Hindi Poetry, Samyik Kavita, Indian Poetry, Modern Poetry
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